देहरादून। भाऊवाला के ग्राम कांसवाली कोठरी के वादियों में स्थित एलएसिटी नामक इस सोसाइटी में हर प्रकार की आधुनिक सुख-सुविधाओं का सपना दिखाकर लगभग सौ परिवारों को ऐसे आशियाने सौंप दिए गए, जो आज किसी भूत बंगले से कम प्रतीत नहीं होते। भूत बंगला इसलिए, क्योंकि यह स्थान अब इंसानों के सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन के योग्य नहीं रह गया है।
अपनी पीड़ा साझा करते हुए यहां के निवासियों ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। साथ ही, बरसात के दिनों में जल निकासी के लिए समुचित ड्रेनेज व्यवस्था न होने के कारण हर समय किसी बड़े हादसे का खतरा बना रहता है।
बच्चों के खेलने के लिए बनाए गए पार्क आज बदहाली का शिकार हैं। वहां न तो साफ-सफाई की कोई व्यवस्था है और न ही रखरखाव। परिणामस्वरूप जहरीले सांप, बिच्छू और अन्य खतरनाक जीवों का आतंक लगातार बना रहता है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं।
गोल्डन फॉरेस्ट तथा झाझरा फॉरेस्ट रेंज के आसपास तारबंदी तो की गई है, लेकिन चोरों ने उसी के बीच अपने छोटे-छोटे ठिकाने बना लिए हैं। मौका मिलते ही वे कॉलोनी में घुस आते हैं और अब तक चार बार चोरी की घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं।

इस सोसाइटी में बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त अधिकारी और उच्च शिक्षित परिवार रहते हैं, लेकिन आज यही एलए सिटी उनके लिए सुकून का नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा का पर्याय बन चुकी है। यहां रहने वाले लोग हर दिन किसी न किसी समस्या से जूझ रहे हैं और उनकी अंतिम उम्मीद केवल शासन और प्रशासन से ही जुड़ी हुई है।
कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जो अपने आशियाने के साथ-साथ अपने आत्मसम्मान को बचाने की लड़ाई भी हारते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिला मजिस्ट्रेट, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और न्यायालय तक गुहार लगाने के बावजूद उनकी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल सका है।
सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों को झेलनी पड़ रही है। समय पर पानी उपलब्ध न होने के कारण खाना बनाने, कपड़े धोने और दैनिक आवश्यक कार्यों तक में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि शायद मलिन बस्तियों में रहने वाले लोग उनसे अधिक सुकून का जीवन जी रहे हैं, जबकि उन्होंने अपने जीवनभर की कमाई के लाखों रुपये खर्च कर यह मकान खरीदे थे। इसके बावजूद वे आज हर पल डर और असुरक्षा के साये में जीवन बिताने को विवश हैं।
सोसाइटी में कम्युनिटी सेंटर के नाम पर एक भवन का निर्माण तो शुरू किया गया था, लेकिन वह अधूरा छोड़ दिया गया। आज वह जर्जर अवस्था में खड़ा है और टूट-फूट का शिकार होकर बदहाली की कहानी बयां कर रहा है।
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। निवासियों का आरोप है कि अधूरी और जर्जर इमारतों में बाहरी मजदूरों को ठहराया गया है। उनका कहना है कि इन लोगों की पहचान और सत्यापन को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर इन खंडहरनुमा इमारतों में कौन आता है, कौन रहता है और किस उद्देश्य से रहता है, इसका जवाब केवल एलए सिटी प्रबंधन या उसके मालिक ही दे सकते हैं।
आज एलए सिटी के निवासी सुविधाओं से अधिक सुरक्षा, सम्मान और मूलभूत आवश्यकताओं की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते शासन और प्रशासन ने उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया, तो यह कॉलोनी भविष्य में किसी बड़े हादसे की वजह भी बन सकती है।
