2027 चुनाव से पहले CM धामी का नया दांव, सीधे जनता से कनेक्शन का प्लान?

2027 चुनाव से पहले CM धामी का नया दांव, सीधे जनता से कनेक्शन का प्लान?

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को देखते हुए सीएम पुष्कर सिंह धानी ने नया दाँव चला है. सरकार ने जनता तक अपनी पहुँच बनाने के लिए रणनीति बनाई है, जिसके तहत अब सरकार सीधे आम लोगों से जुड़ने की कोशिश करेगी.
2027 चुनाव से पहले CM धामी का नया दांव, सीधे जनता से कनेक्शन का प्लान
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने चला दांव

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकार के कामकाज को देहरादून की सीमा से बाहर ले जाने का प्लान बनाया है. इस पहली तस्वीर चंपावत के बनबसा में हुई कैबिनेट बैठक से साफ़ हुई. सीएम ने संकेत दिए कि इसी तरह दूसरे जिलों में भी कैबिनेट बैठकें होंगी. ताकि की सरकार की मौजूदगी जनता के बीच दर्ज कराई जा सके.

 

बनबसा के एनएचपीसी परिसर में हुई बैठक चंपावत जिले के इतिहास में पहली राज्य कैबिनेट बैठक थी. इसमें 24 प्रस्तावों पर फैसला लिया गया. रोजगार और कौशल विकास से लेकर भूमि, शिक्षा, प्रशासन और पंतनगर एयरपोर्ट विस्तार तक कई महत्वपूर्ण विषय कैबिनेट के सामने आए.

सीमांत जिले में पूरी सरकार का पहुंचना अपने आप में एक संदेश है. पहाड़ और सीमावर्ती क्षेत्रों की अक्सर यह शिकायत रही है कि शासन देहरादून में केंद्रित है. धामी सरकार इसी दूरी को कम करने की बात कर रही है.

 

सरकार का जनता तक पहुंचने का प्लान
देहरादून से बाहर कैबिनेट करने का प्रयोग उत्तराखंड के लिए बिल्कुल नया नहीं है. पूर्व की सरकारें गैरसैंण, हरिद्वार, अल्मोड़ा, केदारनाथ, टिहरी और पौड़ी जैसे स्थानों पर कैबिनेट बैठकें कर चुकी हैं. इसलिए धामी की पहल को केवल बैठक की जगह से नहीं आंका जा सकता. उनकी रणनीति तभी अलग मानी जाएगी जब जिलों में कैबिनेट अपवाद के बजाय लगातार चलने वाली व्यवस्था बने और स्थानीय मुद्दे सीधे फैसलों में दिखाई दें.

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रयोग का एक व्यावहारिक पक्ष भी है. किसी जिले में मुख्यमंत्री के साथ मंत्री और शासन के वरिष्ठ अधिकारी पहुंचते हैं तो स्थानीय प्रशासन के पास अपने बड़े और लंबित मुद्दे सीधे सरकार के सामने रखने का अवसर होता है.

अगर कैबिनेट के साथ जिले की सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि और लंबित विकास योजनाओं की समीक्षा भी होने लगे तो फैसलों की रफ्तार बढ़ सकती है. दूरस्थ क्षेत्रों के लिए इसका वास्तविक फायदा तभी होगा जब बैठक खत्म होने के बाद भी उन फैसलों की निगरानी जारी रहे.

 

2027 से पहले धामी का राजनीतिक दांव
इस पहल की टाइमिंग इसे राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाती है. सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी हिस्से में है और अगला विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है. ऐसे समय अलग-अलग जिलों में कैबिनेट करने से धामी को दो फायदे मिल सकते हैं. पहला, सरकार स्थानीय मुद्दों को सीधे पकड़ सकती है। दूसरा, मुख्यमंत्री यह संदेश दे सकते हैं कि उनकी सरकार चुनाव से पहले केवल देहरादून में बैठकर रिपोर्ट नहीं देख रही, बल्कि खुद जनता तक पहुंच रही है.

यही इस रणनीति का चुनावी पक्ष है. अगर स्थानीय स्तर पर कुछ पुराने काम तेजी से पूरे होते हैं तो उसका राजनीतिक लाभ भी सरकार को मिल सकता है. उनसे पहले उत्तराखंड के कई मुख्यमंत्री राजधानी से बाहर सरकार ले जाने का प्रयोग कर चुके हैं. किसी ने गैरसैंण के जरिए पहाड़ का संदेश दिया तो किसी ने अलग-अलग जिलों में बैठक कर क्षेत्रीय विकास को सामने रखा.

धामी के लिए चुनौती इसलिए बड़ी है। केवल दूसरी जगह कैबिनेट कर देना उन्हें पूर्व मुख्यमंत्रियों से अलग नहीं करेगा. अंतर तभी बनेगा जब इन बैठकों को स्थानीय समस्याओं के समाधान और उनकी जवाबदेही से जोड़ा जाए. बनबसा से शुरुआत हो गई है, अब अगली बैठकों से पता चलेगा कि यह व्यवस्था सरकार की नई कार्यशैली बनती है या चुनावी वर्ष की सक्रियता तक सीमित रहती है.

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